Followers

Wednesday, 30 December 2020

सुपरस्टार रजनीकांत

 


रजनीकांत आम लोगों के लिए उम्मीद का प्रतीक। यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि रजनीकांत ऐसे इंसान हैं जिन्होंने फर्श से अर्श तक आने की कहावत को सत्य साबित करके बताया हो। दुनिया में ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने बड़ी-बड़ी सफलताएं अर्जित की पर जिस तरह रजनीकांत ने अभावों और संघर्षों में इतिहास रचा है वैसा पूरी दुनिया में कम ही लोग कर पाएं होंगे। 


 


एक कारपेंटर से कुली बनने, कुली से बी.टी.एस. कंडक्टर और फिर एक कंडक्टर से विश्व के सबसे ज्यादा प्रसिद्ध सुपरस्टार बनने तक का सफ़र कितना परिश्रम भरा होगा ये हम सोच सकते हैं। रजनीकांत का जीवन ही नहीं बल्कि फिल्मी सफ़र भी कई उतार चढ़ावों से भरा रहा है। जिस मुकाम पर आज रजनीकांत काबिज हैं उसके लिए जितना परिश्रम और त्याग चाहिए होता है शायद रजनीकांत ने उससे ज्यादा ही किया है।


संघर्षपूर्ण बचपन


रजनीकांत का जन्म 12 दिसम्बर 1950 को कर्नाटक के बैंगलोर में एक बेहद मध्यमवर्गीय मराठी परिवार में हुआ था। वे अपने चार भाई बहनों में सबसे छोटे थे। उनका जीवन शुरुआत से ही मुश्किलों भरा रहा, मात्र पांच वर्ष की उम्र में ही उन्होंने अपनी माँ को खो दिया था। पिता पुलिस में एक हवलदार थे और घर की माली स्थिति ठीक नहीं थी। रजनीकांत ने युवावस्था में कुली के तौर पर अपने काम की शुरुआत की फिर वे बी.टी.एस में बस कंडक्टर (bus conductor) की नौकरी करने लगे।


रजनीकांत का अंदाज़


एक कंडक्टर के तौर पर भी उनका अंदाज़ किसी स्टार से कम नहीं था। वो अपनी अलग तरह से टिकट काटने और सीटी मारने की शैली को लेकर यात्रियों और दुसरे बस कंडक्टरों के बीच विख्यात थे। कई मंचों पर नाटक करने के कारण फिल्मों और एक्टिंग के लिए शौक तो हमेशा से ही था और वही शौक धीरे धीरे जुनून में तब्दील हो गया। लिहाज़ा उन्होंने अपना काम छोड़ कर चेन्नई के अद्यार फिल्म इंस्टिट्यूट में दाखिला ले लिया। 


 


वहां इंस्टिट्यूट में एक नाटक के दौरान उस समय के मशहूर फिल्म निर्देशक के. बालचंद्र की नज़र रजनीकांत पर पड़ी और वो रजनीकांत से इतना प्रभावित हुए कि वहीँ उन्हें अपनी फिल्म में एक चरित्र निभाने का प्रस्ताव दे डाला। फिल्म का नाम था अपूर्व रागांगल। रजनीकांत की ये पहली फिल्म थी पर किरदार बेहद छोटा होने के कारण उन्हें वो पहचान नहीं मिल पाई, जिसके वे योग्य थे। लेकिन उनकी एक्टिंग की तारीफ़ हर उस इंसान ने की जिसकी नज़र उन पर पड़ी।


विलेन से हीरो बने



रजनीकांत का फिल्मी सफ़र भी किसी फिल्म से कम नहीं। उन्होंने परदे पर पहले नकारात्मक चरित्र और विलेन के किरदार से शुरुआत की, फिर साइड रोल किये और आखिरकार एक हीरो के तौर पर अपनी पहचान बनाई। हालांकि रजनीकान्त, निर्देशक के. बालचंद्र को अपना गुरु मानते हैं पर उन्हें पहचान मिली निर्देशक एस.पी मुथुरामन की फिल्म चिलकम्मा चेप्पिंडी से।


 


 इसके बाद एस.पी. की ही अगली फिल्म ओरु केल्विकुर्री में वे पहली बार हीरो के तौर पर अवतरित हुए। इसके बाद रजनीकांत ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और दर्जनों हिट फिल्मों की लाइन लगा दी। बाशा, मुथू, अन्नामलाई, अरुणाचलम, थालाप्ति उनकी कुछ बेहतरीन फिल्मों में से एक हैं।


उम्र कोई मायने नहीं रखती


रजनीकांत ने यह साबित कर दिया की उम्र केवल एक संख्या है और अगर व्यक्ति में कुछ करने की ठान ले तो उम्र कोई मायने नहीं रखती। 65 वर्ष के उम्र के पड़ाव पर वे आज भी वे शिवाजी- द बॉस, रोबोट, कबाली जैसी हिट फिल्में देने का माद्दा रखते हैं। 65 वर्षीय रजनीकांत के लोग इतने दीवाने है कि कबाली फिल्म ने रिलीज़ होने से पहले ही 200 करोड़ रूपये कमा लिए। 


 


एक समय ऐसा भी था जब एक बेहतरीन अभिनेता होने के बावजूद उन्हें कई वर्षों तक नज़रंदाज़ किया जाता रहा पर उन्होंने अपनी हिम्मत नहीं हारी। ये बात रजनीकांत के आत्मविश्वास को और विपरीत परिस्तिथियों में भी हार न मानने वाले जज्बे का परिचय देती है।


जमीन से जुड़े हुए


रजनीकांत आज इतने बड़े सुपर सितारे होने के बावजूद ज़मीन से जुड़े हुए हैं। वे फिल्मों के बाहर असल जिंदगी में एक सामान्य व्यक्ति की तरह ही दिखते है। वे दूसरे सफल लोगों से विपरीत असल जिंदगी में धोती-कुर्ता पहनते है। शायद इसीलिए उनके प्रशंसक उन्हें प्यार ही नहीं करते बल्कि उनको पूजते हैं। रजनीकांत के बारे में ये बात जगजाहिर है कि उनके पास कोई भी व्यक्ति मदद मांगने आता है वे उसे खाली हाथ नहीं भेजते। 


 


रजनीकांत कितने प्रिय सितारे हैं, इस बात का पता इसी से लगाया जा सकता है कि दक्षिण में उनके नाम से उनके प्रशंसकों ने एक मंदिर बनाया है। इस तरह का प्यार और सत्कार शायद ही दुनिया के किसी सितारे को मिला हो। चुटुकलों की दुनिया में रजनीकांत को ऐसे व्यक्ति के रूप में जाना जाता है जिसके लिए नामुनकिन कुछ भी नहीं और रजनीकांत लगातार इस बात को सच साबित करते रहते है। आज वे 65 वर्ष की उम्र में रोबोट-2 फिल्म पर काम कर रहे है, उनका यही अंदाज लोगों के दिलों पर राज करता है।

अल्बर्ट आइंस्टीन

 


अल्बर्ट आइंस्टीन (albert einstein) दुनिया के महान वज्ञानिक और थ्योरिटिकल भौतिकवादी थे। आइंस्टीन पूरे विश्व में द्रव्मान और ऊर्जा के समीकरण  E= mc2 और सपेक्षता के सिध्दांत के लिये प्रसिद्ध थे। ये समीकरण अल्बर्ट आइंस्टीन के सबसे प्रसिद्ध समीकरणों में से एक था। इन्होने अपने जीवन में बहुत से खोज किये। उनके कुछ अविष्कार पुरे दुनिया  में बहुत फेमस हुआ जिनके वजह से अल्बर्ट आइंस्टीन का नाम इतिहास के सुनहरे पन्नो में दर्ज हो गया। आइंस्टीन एक बुद्धिमान और सफल वज्ञानिक रहे है।

 

धुनिक समय के भौतिक विज्ञान को सरल बनाने में इनका बहुत बड़ा हाथ रहा है। अल्बर्ट आइंस्टीन को 1921 में प्रकाश विधुत उत्सर्जन की खोज के  लिए इनका नोबेल पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। आइंस्टीन ने बहुत से खोज में अपना योगदान दिया है जैसे – सापेक्ष ब्राम्हण, क्वांटम सिद्धांत, अणुओ की ब्राउनियन गति, विकिरण का सिद्धांत और अन्य बहुत से खोज में अपना योगदान दिया है।

 

इन्होने 50 से अधिक शोध पत्र और विज्ञानं की अलग अलग किताबे भी लिखी है जिसकी वजह से 1999 में टाइम्स पत्रिका में इनको शताब्दी पुरुष घोषित किया गया और एक सर्वे के अनुसार ये सार्वकालिक महानतम वज्ञानिक मने गए है। इनकी बौद्धिक उपयोगितो को देखते हुए आइंस्टीन शब्द को बुद्धिमान का पर्याय बना दिया गया है।

 

नाम – अल्बर्ट हेर्मन्न आइंस्टीन

जन्म – 14 मार्च 1879

स्थान – उल्मा (जर्मनी)

पिता – हेर्मन्न आइंस्टीन

माता – पौलिन  कोच

पुरस्कार – भौतिक का नोबेल पुरस्कार, मैक्स प्लैंक पदक, कोल्पे पदक

मृत्यु – 18 अप्रैल 1955

प्रारंभिक जीवन Earlier Life

विश्वप्रसिद्ध अल्बर्ट आइंस्टीन का जन्म 14 मार्च 1879 को जर्मनी के एक यहूदी परिवार में वुटेमबर्ग नामक स्थान में हुआ था। इनके पिता का नाम हेर्मन्न आइंस्टीन जोकि पेशे से एक इंजीनियर और सेल्समैन थे।

इनकी माता का नाम पौलिन  कोच था। आइंस्टीन बचपन से पढाई में अव्वल थे लेकिन बचपन में आइंस्टीन को बोलने में थोड़ी दिक्कत होती थी।

इनकी मात्रभाषा जर्मन थी लेकिन बाद में इन्होने अंगेजी और इतालवी भी सीखी। इनका जन्म तो जर्मनी के उल्म शहर में हुआ लेकिन इनका परिवार 1880 में म्यूनिख शहर चला गया। वहीँ पर इन्होने अपनी पढाई शुरू की। आइंस्टीन पिता और उनके चाचा ने म्यूनिख शहर में एक कंपनी खोली जिसका नाम “इलेक्ट्राटेक्निक फ्रैबिक जे आइंस्टीन एंड सी” (Elektrotechnische Fabrik  J.Einstein & Cie) था, जोकि बिजली के उपकरण बनती थी।

शिक्षा Education

अल्बर्ट आइंस्टीन का परिवार यहूदी धर्म को मानते थे और जिसकी वजह से आइंस्टीन को पढने के लिए कैथोलिक विद्यालय में जाना पड़ा। आइंस्टीन की माँ को सारंगी बजाना आता था। इन्होने अपनी माँ से सारंगी बजाना सिखा लेकिन बाद में इन्होने इसे बजन छोड़ दिया। बाद में 8 साल की उम्र में आइंस्टीन वहां से स्थान्तरित होकर लुइटपोल्ड जिम्रेजियम चले गए।


जहाँ से आइंस्टीन ने अपनी माध्यमिक शिक्षा और उच्च माध्यमिक शिक्षा भी प्राप्त की। सन 1895 में आइंस्टीन ने स्विस फ़ेडरल पोलिटेक्निक की परिक्षा दी, जो बाद में Edigenossische Technische Hochschule (ETH) के नाम से जाना जाने लगा। उस वक़्त इनकी उम्र 16 साल थी। लेकिन गणित और भौतिक के विषय को छोड़ कर बाकि सभी विषयों में फेल हो गये थे। और अंत में वहां से प्रधानाचार्य के सलाह पर वो स्विट्जर्लैंड के आरू में आर्गोवियन कैंटोनल स्कूल में चले गये।  यहाँ से आइंस्टीन ने डिप्लोमा किया और उसके बाद इन्होने 1896 में इन्होने फेडरल इंस्टिटयूट ऑफ़ टेक्नोलोजी में दाखिला लिया।

 

सन 1900 में अल्बर्ट आइंस्टीन ने फेडरल इंस्टिटयूट ऑफ़ टेक्नोलोजी से ग्रेजुएशन किया। सन 1902 में इन्होने मरिअक से शादी कर ली। मरिअक उनकी साथ में ही पढ़ती थी और प्यार के कारण इन्होने उनसे शादी कर ली। शादी के बाद इनके 2 बेटे हुए।  आइंस्टीन ने वहां से ही डाक्टरेट की उपाधि भी ली और अपना पहला विज्ञानं दस्तावेज लिखा।

अल्बर्ट आइंस्टीन का करियर और उनकी खोज (Invention and Career)

अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपनी डाक्टरेट लेने के बाद इन्होने बहुत से विज्ञानं दस्तावेज लिखा जिसकी वजह से ये बहुत ही प्रसिद्ध हुए। यूनिवर्सिटी में जॉब करने के लिए इन्होने बहुत मेहनत किया। और सन 1909 में ये बर्न यूनिवर्सिटी के लेक्चरर बन गये। कुछ दिन के इन्होने 2 और यूनिवर्सिटी में प्राचार्य के रूप में काम किया और कुछ ही दिनों में फेडरल इंस्टिटयूट ऑफ़ टेक्नोलोजी में प्राचार्य बनाये गए। सन 1913 में मैक्स प्लांक और वाल्थेर नेंस्र्ट के द्वारा दिए गए अवसर पर आइंस्टीन बर्लिन चले गए। जिसकी वजह से इनका तलाक हो गया। बर्लिन जाने के बाद इन्होने एलसा नाम के लड़की से शादी कर ली।

अल्बर्ट आइंस्टीन के अविष्कार Inventions of Albert Einstein

अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपने जीवन में बहुत से अविष्कार किये है जिनकी वजह से वो पूरे विश्व में प्रसिद्ध हुए। उनके कुछ खोज इस प्रकार है-

E= mc2

अल्बर्ट आइंस्टीन के द्वारा प्रमाणित द्रव्मान और ऊर्जा का ये समीकरण है जिसको आज नयूक्लेअर ऊर्जा के नाम से जाना जाता है।

स्पेशल थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी

आइंस्टीन ने एक थ्योरी में गति  और समय के सम्बन्ध को समझाया है।

प्रकाश की क्वांटम थ्योरी

अल्बर्ट आइंस्टीन की प्रकाश की क्वांटम थ्योरी में उन्होंने ऊर्जा की छोटी थैली को फोटान कहा है और तंरंगों की विशेषता बताई है। इनके अनुसार धातुओ में से इलेक्ट्रान निकलते है और वो फोटो इलेक्ट्रिक इफेक्ट की रचना करते है। इसी थ्योरी के आधार पर टेलीविजन की खोज भी हुई।

 

रेफिजरेटर की खोज

ये आइंस्टीन का सबसे छोटा खोज था। इसको बनाने में इन्होने ज्यादा समय नही लगाया था। इसमें ऊर्जा के रूप में इन्होने अमोनिया, पानी, और ब्यूटेन का प्रयोग किया था।

आकाश नीला क्यों होता है?

ये एक छोटा सा प्रमाण था जिसमे इन्होने प्रकाश के प्रिकिर्णन के बारे में बताया है और यही एक वजह है जिसकी वहज से आकाश नीला दिखाई देता है

इनके द्वारा और भी बहुत से खोज की गई है जिनकी वजह से ये पुरे विश्व में प्रसिद्ध हो गये।

पुरस्कार Awards

अल्बर्ट आइंस्टीन ने बहुत से खोज किये और जिसकी वजह से उनको कई सरे पुरस्कार से नवाजा भी गया है सबसे पहला 1921 भौतिकी का नोबेल पुरस्कार, मत्तयूक्की मेडल, 1925 में कोपले मैडल, सन 1929 में मैक्स प्लांक मेडल मिला और 1999 में शताब्दी के टाइम पर्सन का पुरस्कार भी मिला।

मृत्यु Death

हिटलर के समय में अल्बर्ट आइंस्टीन को जर्मनी छोड़ कर जाना पड़ा क्योकि ये यहूदी थे। कुछ सालो तक अमेरिका में प्रिस्टन कालेज में कार्य करते हुए 18 अप्रैल सन 1955 में इनकी मृत्यु हो गई। दुनिया के महान वैज्ञानिक जिन्होंने अपने ज्ञान से दुनिया को बहुत कुछ दिया, और उनकी खोज को कभी भी

स्टीफन हॉकिंग



 स्टीफन हॉकिंग एक अंग्रेजी सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी, ब्रह्मविज्ञानी और लेखक थे। वह स्पष्ट रूप से ब्रह्मांड के उद्गम और ब्रह्मांड और भौतिकी के कुछ सबसे जटिल पहलुओं में स्पष्ट रूप से व्याख्या करने के अपने प्रयासों के लिए जाना जाता है। सापेक्षता और क्वांटम यांत्रिकी के सामान्य सिद्धांत के एक संघ द्वारा समझाया गया ब्रह्मांड विज्ञान के एक सिद्धांत की पेशकश करने वाले स्टीफन हॉकिंग पहले वैज्ञानिक थे।

प्रारंभिक जीवन Early Life

स्टीफन विलियम हॉकिंग का जन्म 8 जनवरी 1942 को इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड में हुआ था। उनका परिवार लंदन से ऑक्सफोर्ड चले गए थे। एक बच्चे के रूप में, उन्होंने असाधारण प्रतिभा और अपरंपरागत अध्ययन विधियों को दिखाया।

शिक्षा Education

स्कूल छोड़ने पर, उन्हें यूनिवर्सिटी कॉलेज, ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में जगह मिली जहां उन्होंने भौतिकी का अध्ययन किया। ऑक्सफोर्ड, रॉबर्ट बर्मन में उनके भौतिकी के शिक्षक ने बाद में कहा कि स्टीफन हॉकिंग एक असाधारण छात्र थे।

 

भौतिकी में एक बीए होनोर्स प्राप्त करने पर, उन्होंने संक्षेप में खगोल विज्ञान का अध्ययन करने के लिए रुके थे, लेकिन वे ट्रीनिटी कॉलेज, कैंब्रिज में चले गए, जहां वे सैद्धांतिक खगोल विज्ञान और ब्रह्माण्ड विज्ञान के लिए अपने जुनून को आगे बढ़ाने में सक्षम थे ।

उनकी बीमारी His illness

यह कैम्ब्रिज में था कि स्टीफन हॉकिंग के शरीरी में न्यूरो-पेशी समस्याओं के लक्षण विकसित शुरू हुए। मोटर न्यूरॉन रोग एक प्रकार का रोग होता है जिसमे जल्दी से शारीरिक गतिविधियों बंद होने लगती है। उनका बोलना-चलना बंद हो गया, और वह खुद को हिलाने में असमर्थ हो गये। एक स्तर पर, डॉक्टरों ने उन्हें तीन साल का जीवन काल दे दिया था।

 

हालांकि, रोग की प्रगति धीमा हो गई है, और उन्होंने अपने अनुसंधान और सक्रिय सार्वजनिक कार्यक्रमों को जारी रखने के लिए अपनी गंभीर विकलांगता को दूर करने में कामयाबी हासिल की है। कैम्ब्रिज में, एक साथी वैज्ञानिक ने एक कृत्रिम भाषण उपकरण विकसित किया जिसने उसे एक टचपैड का उपयोग करके बोलने दिया।

 

यह प्रारंभिक सिंथेटिक भाषण ध्वनि स्टीफन हॉकिंग की ‘आवाज’ बन गई है, और परिणामस्वरूप, उन्होंने इस शुरुआती मॉडल की मूल ध्वनि को रखा है – तकनीकी प्रगति के बावजूद। फिर भी, नवीनतम तकनीक के बावजूद, यह अभी भी उसके लिए संचार करने के लिए एक समय लेने वाली प्रक्रिया हो सकती है। स्टीफन हॉकिंग ने अपनी विकलांगता के लिए व्यावहारिक दृष्टिकोण लिया है। उन्होंने कभी भी अपने रोग को अपने ऊपर हावी होने नहीं दिया।सैद्धांतिक ब्रह्माण्ड विज्ञान और क्वांटम ग्रेविटी में स्टीफन हॉकिंग के प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं।

मुख्य कार्य Major Works

कई अन्य उपलब्धियों में, उन्होंने अल्बर्ट आइंस्टीन के सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत के लिए गणितीय मॉडल विकसित किया। उन्होंने ब्रह्माण्ड, बिग बैंग और ब्लैक होल की प्रकृति पर बहुत काम किया। 1974 में, उन्होंने अपने सिद्धांत को रेखांकित किया कि ब्लैक होल ऊर्जा रिसाव करते हैं और कुछ भी नहीं दर हो जाती हैं यह 1974 में “हॉकिंग विकिरण” के रूप में जाना जाता है। गणितज्ञों रोजर पेनरोस के साथ उन्होंने दिखाया कि आइंस्टीन के सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत का अर्थ है अंतरिक्ष और समय बिग बैंग में शुरू होगा और काला छेद(ब्लैक होल) में अंत होगा।

 

अपनी पीढ़ी के सबसे अच्छे भौतिकविदों में से एक होने के बावजूद, वह सामान्य भौतिकी मॉडल को आम जनता के लिए एक सामान्य समझ में अनुवाद करने में सक्षम हो गए। उनकी पुस्तकों – समय का एक संक्षिप्त इतिहास और एक संक्षिप्त में ब्रह्मांड दोनों बहुत मशहूर बन गए हैं – 230 दिनों से अधिक समय के लिए अधिग्रहण सूची में रहने वाले एक संक्षिप्त इतिहास के साथ-साथ 10 मिलियन से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं। अपनी पुस्तकों में, हॉकिंग हर रोज़ भाषा में वैज्ञानिक अवधारणाओं को समझने की कोशिश करता थे और ब्रह्मांड के पीछे कार्य करने के लिए एक सिंहावलोकन देते थे।

 

स्टीफन हॉकिंग अपनी पीढ़ी के सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिकों में से एक बन गए । वह बार-बार सार्वजनिक कार्यक्रमों में काम करते थे और अपने कार्यक्रमों से लोकप्रिय मीडिया संस्कृति में खुद को चित्रित करते थे, जैसे कि ‘द सिम्पसन्स टू स्टार ट्रेक’। 1990 के दशक के अंत में, उन्हें कथित रूप से एक नाइटहुड की पेशकश की गई थी, लेकिन 10 साल बाद उन्होंने यह साबित कर दिया कि उन्होंने विज्ञान के लिए सरकार के वित्त पोषण के साथ मुद्दों पर इसे बदल दिया था।

उन्होंने 1965 में एक भाषा के छात्र जेन वाइल्ड से शादी की। उन्होंने कहा कि यह उनके लिए एक वास्तविक मोड़ था जब वे अपनी बीमारी के कारण मौत के साथ थे। बाद में उन्होंने तलाक दे दिया लेकिन उनके तीन बच्चे थे।

मृत्यु Death

स्टीफन हॉकिंग का कैम्ब्रिज में अपने घर पर 14 मार्च 2018 को निधन हो गया।

ब्रूस ली हिंदी कहानी

 



ब्रूस ली का प्रारंभिक जीवन और कैरियर

ब्रूस ली का जन्म 27 नवम्बर, 1940 को, सन फ्रांसिस्को, कैलिफ़ोर्निया में पिता ली होई छुएँ(Lee Hoi Chuen) और माता ग्रेस हो(Grace Ho) के घर हुआ। ब्रूस ली के पिता Lee Hoi Chuen होंग कोंग में ओपेरा सिंगर(Opera Singer) थे और ब्रूस ली को मिलाकर उनके कुल 4 संतान थे। Bruce Lee बचपन से ही होंग कांग में रहते थे और एक काबिल अभिनेता थे जो बाद में अमेरिका चले गए जहाँ उन्होंने मर्सिअल आर्ट्स सिखाया।

 

उन्होंने टेलीविज़न में भी अभिनय किया, उनकी कुछ जबरदस्त फ़िल्में और टीवी सीरियल के नाम हैं The Green Hornet (1966-67) ,Chinese Connection और Fists of Fury. उनकी फिल्म Enter the Dragon के बाद ही 20 जुलाई, 1973 को उनका निधन हो गया 32 वर्ष कि आयु में। उनका नाम ब्रूस(Bruce)  उस हॉस्पिटल के नर्स नें रखा था जहाँ उनका जन्म हुआ हलाकि उनके शुरुवाती स्कूल में उनके इस नाम का उपयोग उनके माता पिता ने नहीं किया। Bruce ने अपने जीवन में 3 महीने की उम्र में पहली फिल्म में 1941 में काम किया जिसका नाम था Golden Gate Girl.

 

साल 1946 के शुरुवात तक ब्रूस ली कुल 20 फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में दिखे। उन्होंने अपने जीवन में नृत्य भी सिखा और Hong Kong के Cha-Cha कम्पटीशन को भी जीता साथ ही उनको उनकी कविताओं के लिए भी जाना जाता है।

जब ब्रूस ली किशोर थे तो उनके चीनी होने के कारण उन्हें ब्रिटिश लड़के ताना मारा करते थे। बाद में उन्होंने साल 1953 में कुंगफू मास्टर यिप मैन के संरक्षण में कुंफू की पूर्ण शिक्षा ली और बाद में वे अमरीका अपने परिवार के पास Seattle, Wasington चले गए। वहां उन्होंने नृत्य प्रशिक्षक के रूप में कार्य किया।

 

ब्रूस ली ने अपनी हाई स्कूल कि शिक्षा एडिसन, यूनिवर्सिटी ऑफ़ वाशिंगटन से पूरा किया। उनको एक नौकरी भी मिली थी जिसमे वे होंग कांग में सीखे हुए मार्शल आर्ट के विंग चुन स्टाइल का ट्रेनिंग दिया करते थे। इसी बिच उनकी मुलाकात लिंडा एमरी (Linda Emery) से हुई, जिससे 1964 में ली नें विवाह किया और उसके बाद उन्होंने सीएटल में स्वयं का मार्शल आर्ट स्कूल खोला।

 

बाद में वे Linda के साथ ओकलैंड और लोस एंजेलेस (Oakland and Los Angeles) गए जहाँ उन्होंने और 2 मर्तिअल आर्ट्स स्कूल खोले। उन्होंने अपना सबसे जबरदस्त स्टाइल जो खासकर सिखया उसका नाम है जीत कुने दो (Jeet Kune Do) या मुट्ठी को भेदने के तरीका (The Way of the Intercepting Fist). बाद में उनके 2 बच्चे भी हुए जिनके नाम हैं ब्रैंडन (Brandon) जिसका जन्म 1965 में हुआ, और शन्नों (Shannon), जिसका जन्म 1969 में हुआ।

अभिनेता के रूप में ब्रूस ली Bruce Lee as an Actor in Hindi

टीवी सीरियल The Green Hornet में कुल 26 एपिसोड में काम किया जिसमे वे अपने एक्रोबेटिक और फाइटिंग स्टाइल का प्रदर्शन किया। उन्होंने Ironside और Longsteet जैसे टीवी शो में गेस्ट अप्पीरिअंस भी दिया। वे कुंफू (Kung Fu) नमक एक टीवी शो में भी अपना आईडिया दिया परन्तु उसमे कार्य डेविड कार्रडाइन (David Carradine) ने किया था। 1971 में ब्रूस ली लोस एंजेलेस को छोड़ होंग कंग चले गए।

 

उनकी कुछ बॉक्स ऑफिस तोड़ देने वाली फिल्मे हैं – Fists of Fury जो 1971 के आखरी समय में रिलीज़ हुई थी। The Green Hornet जिसमे उन्होंने अपने जीत कुने दो कि काबिलियत को भी बखूबी दर्शाया है। वर्ष 1972 में The Chinese Connection फिल्म नें उनके पिछले फिल्मो को पीछे कर दिया बॉक्स ऑफिस में धमाल मचाते हुए लेकिन Critic लोगों कि वजह से अमेरिका में इसका बोल बाला थोडा ठंडा रहा। उनका सबसे बड़ा Hollywood प्रोजेक्ट रहा, Enter the Dragon फिल्म।

ब्रूस ली की रहस्यमय मौत


ब्रूस ली कि मौत ने लोगों को बड़ी ही अचम्भे में डाला था। इतने मशहूर मार्शल आर्ट ट्रेनी और सुपरस्टार की अचानक मौत नें सबको चिंता में दल दिया। 20 जुलाई 1973 को उनकी फिल्म Enter the Dragon के लांच से पहले ही 32 वर्ष कि उम्र में उनका निधन हो गया।

Officialy उनकी मौत का कारण दिमाग में सुजन बताया गया, जो पैन किलर दवाई के रिएक्शन के कारण हुआ था। कुछ लोगों का तो यह भी कहना था की उनका खून किया गया था।

ब्रूस ली के विषय में 20 दिलचस्प तथ्य जो आप नहीं जानते

  • ब्रूस ली ने अपनी अधिकतम फिल्मो में स्वयं अंग्रजी भाषा खुद कहा है।
  • ब्रूस ली आधे तौर पर जर्मन थे क्योंकि उनके दादाजी 100% जर्मनी के थे।
  • वे बहुत ही खतरनाक और जबरदस्त ड्राईवर थे।
  • ब्रूस ली कि नज़र कमजोर थी।
  • ब्रूस ली के परिवार वाले उन्हें लिटिल फ़ीनिक्स(Little Phoenix) के नाम से बुलाते थे।
  • वे होंग कोंग के चा-चा नृत्य के चैंपियन रह चुके थे।
  • ब्रूस ली एक दिन में 5000 पंच मार कर प्रैक्टिस करते थे।
  • वे अपनी ऊँगली कि ताकत से टिन कैन में छेद कर देते थे।
  • हलाकि ब्रूस ली नें पढाई के माध्यम से कराटे नहीं सिखा परन्तु तब भी वह कराटे सही तरीके से जानते थे।
  • ब्रूस ली नें एक फिल्म के लिए कहानी भी लिखा था जिसका नाम थे “The Silent Flute” हलाकि यह फिल्म कभी शूट नहीं हो पाई।
  • ब्रूस ली नें अपने जीवन में कई प्रसिद्ध लोगों को और हीरो-हीरोइने को भी मार्शल आर्ट सिखाया।
  • कहा जाता है जब ब्रूस ली छोटे थे तो उन्हें मिरगी की प्रॉब्लम थी।
  • ब्रूस ली नें अपने शारीर से पसीने निकलने वाली ग्रंथि को निकलवा दिया था।
  • ब्रूस ली बहुत ही अच्छे स्केच आर्टिस्ट थे।
  • ब्रूस ली नें बहुत सारी कवितायेँ भी लिखी थी।
  • ब्रूस ली को The Times Magazine वालों नें टॉप 100, 20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली लोगों की लिस्ट में रखा था।
  • ब्रूस ली नें कहा था कि उनके पिता उनके सबसे पहले मार्शल आर्ट्स के गुरु थे।
  • ब्रूस ली के घर में 2000 किताबों की लाइब्रेरी थी।
  • ब्रूस ली को तैरना नहीं आता था ऐसा उनके भाई रोबर्ट का कहना था।
  • ब्रूस ली का सबसे मशहूर उद्धरण जो उन्होंने कहा था : If I should die tomorrow, I will have no regrets. I did what I wanted to do. You can’t expect more from life. अगर में कल मर जाता हूँ, मुझे कोई दुख नहीं होगा। मैं जो जीवन में करना चाहता था वह कर चूका हूँ, आप जिंदगी से ज्यादा उम्मीद नहीं कर सकते।

बिल गेट्स सर की पूरी कहानी

 


👇👇

बिल गेट्स का वास्तविक तथा पूर्ण नाम विलियम हेनरी गेट्स है।


इनका जन्म 28 अक्टूबर, 1955 को वाशिंगटन के सिएटल में हुआ। इनके परिवार में इनके अतिरिक्त चार और सदस्य थे – इनके पिता विलियम एच गेट्स जो कि एक मशहूर वकील थे, इनकी माता मैरी मैक्‍सवेल गेट्स जो प्रथम इंटरस्टेट बैंक सिस्टम और यूनाइटेड वे के निदेशक मंडल कि सदस्य थी तथा इनकी दो बहनें जिनका नाम क्रिस्टी और लिब्बी हैं।

बिल गेट्स ने अपने बचपन का भी भरपूर आनंद लिया तथा पढ़ाई के साथ वह खेल कूद में भी सक्रिय रूप से भाग लेते रहे।


बिल गेट्स को किसी परिचय कि आवश्यकता नहीं है, वह पूरी दुनिया में अपने कार्यों से जाने जाते हैं। हम सभी यह भली भांति जानते हैं कि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ Software Company “Microsoft” की नींव भी बिल गेट्स के द्वारा ही रखी गयी है।


बिल गेट्स का बचपन -

उनके माता – पिता उनके लिए क़ानून में करियर बनाने का स्वप्न लेकर बैठे थे परन्तु उन्हें बचपन से ही कंप्यूटर विज्ञान तथा उसकी प्रोग्रामिंग भाषाओं में रूचि थी। उनकी प्रारंभिक शिक्षा लेकसाइड स्कूल में हुई। जब वह आठवीं कक्षा के छात्र थे तब उनके विद्यालय ने ऐएसआर – 33 दूरटंकण टर्मिनल तथा जनरल इलेक्ट्रिक (जी।ई।) कंप्यूटर पर एक कंप्यूटर प्रोग्राम खरीदा जिसमें गेट्स ने रूचि दिखाई। तत्पश्चात मात्र तेरह वर्ष की आयु में उन्होंने अपना पहला कंप्यूटर प्रोग्राम लिखा जिसका नाम “टिक-टैक-टो” (tic-tac-toe) तथा इसका प्रयोग कंप्यूटर से खेल खेलने हेतु किया जाता था। बिल गेट्स इस मशीन से बहुत अधिक प्रभावित थे तथा जानने को उत्सुक थे कि यह सॉफ्टवेयर कोड्स किस प्रकार कार्य करते हैं।

कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के प्रति बिल गेट्स की लगन -


इसके पश्चात गेट्स डीईसी (DEC), पीडीपी (PDP), मिनी कंप्यूटर नामक सिस्टमों में दिलचस्पी दिखाते रहे, परन्तु उन्हें कंप्यूटर सेंटर कॉरपोरेशन द्वारा ऑपरेटिंग सिस्टम में हो रही खामियों के लिए 1 महीने तक प्रतिबंधित कर दिया गया। इसी समय के दौरान उन्होंने अपने मित्रों के साथ मिलकर सीसीसी के सॉफ्टवेयर में हो रही कमियों को दूर कर लोगों को प्रभावित किया तथा उसके पश्चात वह सीसीसी के कार्यालय में निरंतर जाकर विभिन्न प्रोग्रामों के लिए सोर्स कोड का अध्ययन करते रहे और यह सिलसिला 1970 तक चलता रहा। इसके पश्चात इन्फोर्मेशन साइंसेस आइएनसी। लेकसाइड के चार छात्रों को जिनमें बिल गेट्स भी शामिल थे, कंप्यूटर समय एवं रॉयल्टी उपलब्ध कराकर कोबोल (COBOL), पर एक पेरोल प्रोग्राम लिखने के लिए किराए पर रख लिया।

इसके पश्चात उन्हें रोकना नामुमकिन था। मात्र 17 वर्ष कि उम्र में उन्होंने अपने मित्र एलन के साथ मिलकर ट्राफ़- ओ- डाटा नामक एक उपक्रम बनाया जो इंटेल 8008 प्रोसेसर (Intel 8008 Processor) पर आधारित यातायात काउनटर (Traffic Counter) बनाने के लिए प्रयोग में लाया गया।
1973 में वह लेकसाइड स्कूल से पास हुए तथा उसके पश्चात बहु- प्रचलित हारवर्ड कॉलेज में उनका दाखिला हुआ।

 

परन्तु उन्होंने 1975 में ही बिना स्नातक किए वहाँ से विदा ले ली जिसका कारण था उस समय उनके जीवन में दिशा का अभाव। उसके पश्चात उन्होंने Intel 8080 चिप बनाया तथा यह उस समय का व्यक्तिगत कंप्यूटर के अन्दर चलने वाला सबसे वहनयोग्य चिप था, जिसके पश्चात बिल गेट्स को यह एहसास हुआ कि समय द्वारा दिया गया यह सबसे उत्तम अवसर है जब उन्हें अपनी स्वयं कि कंपनी का आरम्भ करना चाहिए।

माइक्रोसॉफ्ट कंपनी का उत्थान -

MITS (Micro Instrumentation and Telemetry Systems) जिन्होंने एक माइक्रो कंप्यूटर का निर्माण किया था, उन्होंने गेट्स को एक प्रदर्शनी में उपस्थित होने कि सहमती दी तथा गेट्स ने उनके लिए अलटेयर एमुलेटर (Emulator) निर्मित किया जो Mini Computer और बाद में इंटरप्रेटर में सक्रिय रूप से कार्य करने लगा। इसके बाद बिल गेट्स व् उनके साथी को MITS के अल्बुकर्क स्थित कार्यालय में काम करने कि अनुमति दी गयी। उन्होंने अपनी जोड़ी का नाम Micro-Soft रखा तथा अपने पहले कार्यालय कि स्थापना अल्बुकर्क में ही की।

 

26 नवम्बर, 1976 को उन्होंने Microsoft का नाम एक व्यापारिक कंपनी के तौर पर पंजीकृत किया। Microsoft Basic कंप्यूटर के चाहने वालों में सबसे अधिक लोकप्रिय हो गया था। 1976 में ही Microsoft MITS से पूर्णत: स्वतंत्र हो गया तथा Gates और Allen ने मिलकर कंप्यूटर में प्रोग्रामिंग भाषा Software का कार्य जारी रखा।

 

इनसे बाद Microsoft ने अल्बुकर्क में अपना कार्यालय बंद कर बेलेवुए, वाशिंगटन में अपना नया कार्यालय खोला। Microsoft ने उन्नति की ओर बढ़ते हुए प्रारंभिक वर्षों में बहुत मेहनत व् लगन से कार्य किया। गेट्स भी व्यावसायिक विवरण पर भी ध्यान देते थे, कोड लिखने का कार्य भी करते थे तथा अन्य कर्मचारियों द्वारा लिखे गए व् जारी किये गए कोड कि प्रत्येक पंक्ति कि समीक्षा भी वह स्वयं ही करते थे।

 

इसके बाद जानी मानी कंपनी IBM ने Microsoft के साथ काम करने में रूचि दिखाई, उन्होंने Microsoft से अपने पर्सनल कंप्यूटर के लिए बेसिक इंटरप्रेटर बनाने का अनुरोध किया। कई कठिनाइयों से निकलने के बाद गेट्स ने Seattle कंप्यूटर प्रोडक्ट्स के साथ एक समझौता किया जिसके बाद एकीकृत लाइसेंसिंग एजेंट और बाद में 86-DOS के वह पूर्ण आधिकारिक बन गए और बाद में उन्होंने इसे आईबीएम को $80,000 के शुल्क पर PC-DOS के नाम से उपलब्ध कराया। इसके पश्चात Microsoft का उद्योग जगत में बहुत नाम हुआ।

 

1981 में Microsoft को पुनर्गठित कर बिल गेट्स को इसका चेयरमैन व् निदेशक मंडल का अध्यक्ष बनाया गया। जिसके बाद Microsoft ने अपना Microsoft Windows का पहला संस्करण पेश किया। 1975 से लेकर 2006 तक उन्होंने Microsoft के पद पर बहुत ही अदभुत कार्य किया, उन्होंने इस दौरान Microsoft कंपनी के हित में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए।

बिल गेट्स का विवाह व् आगे का जीवन -

1994 में बिल गेट्स का विवाह फ्रांस में रहने वाली Melinda से हुआ तथा 1996 में इन्होंने जेनिफर कैथेराइन गेट्स को जन्म दिया। इसके बाद मेलिंडा तथा बिल गेट्स के दो और बच्चे हुए जिनके नाम रोरी जॉन गेट्स तथा फोएबे अदेले गेट्स हैं। वर्तमान में बिल गेट्स अपने परिवार के साथ वाशिंगटन स्थित मेडिना में उपस्थित अपने सुन्दर घर में रहते हैं, जिसकी कीमत 1250 लाख डॉलर है।

बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन का उदय -

वर्ष 2000 में उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशनकी नींव रखी जो कि पारदर्शिता से संचालित होने वाला विश्व का सबसे बड़ा Charitable फाउंडेशन था। उनका यह फाउंडेशन ऐसी समस्याओं के लिए कोष दान में देता था जो सरकार द्वारा नज़रअंदाज़ कर दी जाती थीं जैसे कि कृषि, कम प्रतिनिधित्व वाले अल्पसंख्यक समुदायों के लिये कॉलेज छात्रवृत्तियां, एड्स जैसी बीमारियों के निवारण हेतु, इत्यादि।

परोपकारी कार्य -
सन 2000 में इस फाउंडेशन ने Cambridge University को 210 मिलियन डॉलर गेट्स कैम्ब्रिज छात्रवृत्तियों हेतु दान किये। वर्ष 2000 तक बिल गेट्स ने 29 बिलियन डॉलर केवल परोपकारी कार्यों हेतु दान में दे दिए। लोगों की उनसे बढती हुई उम्मीदों को देखते हुए वर्ष 2006 में उन्होंने यह घोषणा की कि वह अब Microsoft में अंशकालिक रूप से कार्य करेंगे और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन में पूर्णकालिक रूप से कार्य करेंगे। वर्ष 2008 में गेट्स ने Microsoft के दैनिक परिचालन प्रबंधन कार्य से पूर्णतया विदा ले ली परन्तु अध्यक्ष और सलाहकार के रूप में वह Microsoft में विद्यमान रहे।

ए. पी. जे. अब्दुल कलाम की बॉयोग्राफी

 


हमारे देश में एक ऐसी शख्सियत का जन्म हुआ था जिसने राजनीति और विज्ञान के क्षेत्र में हमें बहुत कुछ दिया है और उनके दिए गए आविष्कारों से आज भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व उन पर गर्व करता है।

उस शख्सियत का नाम है ए.पी.जे. अब्दुल कलाम। विज्ञान के क्षेत्र में हमें बहुत कुछ देने वाले इस शख्सियत का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को रामेश्वरम, तमिलनाडु में हुआ। अब्दुल कलाम मुस्लिम धर्म से थे। उनके पिता का नाम जैनुलअबिदीन था जो नाव चलाते थे और इनकी माता का नाम अशिअम्मा था।

 

बचपन और शिक्षा

अब्दुल कलाम का बचपन बहुत ही संघर्षों में गुजरा। क्योंकि ये गरीब परिवार से थे और ये बचपन से ही पढ़ाई के साथ-साथ काम भी करते थे।

जिस प्रकार अखबार बांटने के लिए किसी को काम पर रखा जाता है, उसी तरह अब्दुल कलाम भी बचपन में अखबार बांटने जाया करते थे ताकि वो अपने परिवार का खर्च चला सके।

उन्होंने रामेश्वरम, रामनाथपुरम के स्च्वात्र्ज मैट्रिकुलेशन स्कूल से अपनी प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की। अब्दुल कलाम में बचपन से ही कुछ नया सीखने की जिज्ञासा दृढ़ थी। वो पढ़ाई भी करते तो पूरी लग्न और जिज्ञासा से किया करते थे चाहेे उनके पास कैसा भी समय हो।

काॅलेज और करियर का दौर

अपनी स्कूली शिक्षा के पूर्ण होने के बाद जैसा कि अब्दुल कलाम की रूचि विज्ञान में थी तो उन्हें भौतिक विज्ञान में स्नातक करनी थी। उसके लिए उन्होेंने तिरूचिरापल्ली के सेंट जोसेफ काॅलेज में दाखिला लिया और 1954 में उन्होंने स्नातक की पढ़ाई पूरी कर ली। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद अब्दुल कलाम आगे की पढ़ाई पूरी करना चाहते थे जिसके लिए उन्होंने 1955 में मद्रास की ओर प्रस्थान किया।

वहां जाने के बाद उन्होंने अंतरिक्ष विज्ञान की शिक्षा ग्रहण की। क्योंकि उनकी रूचि भौतिक विज्ञान में ज्यादा थी। उनके शिक्षा का ये दौर करीब 1958 से 1960 तक चलता रहा।

करियर की ओर बढ़ना

अपनी शिक्षा को पूर्ण करने के बाद अब्दुल कलाम ने एक वैज्ञानिक के रूप में डीआरडीओ यानि रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन में काम किया। अब्दुल कलाम का सपना था कि वो भारतीय वायु सेना में एक पायलट बने और देश के लिए कुछ करें।

इसके लिए वो काफी प्रयास करते रहे। लेकिन वो इसमें नहीं जा पाए परंतु उन्होंने अपने इसी सपने को सकारात्मक माध्यम से एक नई दिशा दी और उन्होंने शुरूआत में भारतीय सेना के लिए एक छोटे हेलिकाप्टर का मोडल तैयार किया।

डीआरडीओ में काम करने के बाद अब्दुल कलाम की करियर यात्रा इसरो की ओर बढ़ी। सन् 1969 में उनका कदम इसरो यानि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन पर पड़ा। जहां पर वो कई परियोजनाओं के निदेशक के रूप में काम करते रहे और गर्व की बात ये है कि इसी दौरान 1980 में इन्होंने भारत के पहले उपग्रह ‘‘पृथ्वी‘‘ या एसएलवी3 को पृथ्वी के निकट सफलतापूर्वक स्थापित किया। इन्होंने भारत के लिए ये काम इतना बड़ा कर दिया था कि इनके इस काम की वजह से हमारा देश अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष क्लब का सदस्य बना।

उपलब्धियां

अब्दुल कलाम निरंतर विज्ञान के लिए नया-नया काम करते रहे जिसमें उन्होंने भारत के पहले परमाणु परीक्षण को भी साकार कराने में में अपना सहयोग दिया। इतना ही नहीं इन्होंने नासा यानि नेशनल ऐरोनोटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन की यात्रा भी की।

अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत को इतनी तरक्की दिलाने से भारत सरकार द्वारा 1981 में इन्हें पद्म भूषण से नवाजा गया। सन् 1982 में उन्होंने गाइडेड मिसाइल पर कार्य किया। अंतरिक्ष के क्षेत्र में इतनी लग्न और निष्ठा को देखते हुए भारत सरकार ने 1990 में फिर इन्हें पद्म विभूषण से नवाजा जो कि बहुत ही गर्व की बात है।

अब्दुल कलाम आजाद को रक्षा मंत्री के विज्ञान सलाहाकार के रूप में भी चुना गया। जिस पर वो 1992 से 1999 तक रहे। इतना ही नहीं इस कार्यकाल के मध्य में यानि 1997 में उन्हें भारत रत्न से नवाजा गया। इसी तरह योगदान देते हुए उन्होंने आगे भारत के दूसरे परमाणु परीक्षण को सफल बनाया।

सन् 2002 तक भारत को अब्दुल कलाम इस हद तक ले जा चुके थे जहां तक भारत को सोचना भी मुश्किल था और इसी योगदान की सफलता का फल उन्हें भारत का राष्ट्रपति बनके मिला। 2002 में उन्हें भारत का राष्ट्रपति चुना गया था और ये 2007 तक इस कार्यकाल में रहे। उनको उनके काम की वजह से मिसाइल मेन जैसे कई नामों से जाना जाता है। इसके बाद उन्होंने शिक्षा संस्थाओं के कई पदों पर कार्य किया। 27 जुलाई 2015 को वो शिलोंग के भारतीय प्रबंधन संस्थान में लेक्चर देने गए थे। इसी दौरान उन्हें दिल का दौरा पड़ा और अब्दुल कलाम आजाद को इस दुनिया से विदा होना पड़ा। भले ही आज अब्दुल कलाम इस दुनिया में नहीं लेकिन उन्होंने हमारे भारत को इतना कुछ दिया है कि वो हमारे लिए आज भी जिंदा है।

Tuesday, 29 December 2020

आखिरी उपदेश

गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त कर रहे शिष्यों में आज काफी उत्साह था , उनकी बारह वर्षों की शिक्षा आज पूर्ण हो रही थी और अब वो अपने घरों को लौट सकते थे| गुरु जी भी अपने शिष्यों की शिक्षा-दीक्षा से प्रसन्न थे और गुरुकुल की परंपरा के अनुसार शिष्यों को आखिरी उपदेश देने की तैयारी कर रहे थे।

उन्होंने ऊँची आवाज़ में कहा , ” आप सभी एक जगह एकत्रित हो जाएं , मुझे आपको आखिरी उपदेश देना है .”

गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए सभी शिष्य एक जगह एकत्रित हो गए .

गुरु जी ने अपने हाथ में कुछ लकड़ी के खिलौने पकडे हुए थे , उन्होंने शिष्यों को खिलौने दिखाते हुए कहा , ” आप को इन तीनो खिलौनों में अंतर ढूँढने हैं।”

सभी शिष्य ध्यानपूर्वक खिलौनों को देखने लगे , तीनो लकड़ी से बने बिलकुल एक समान दिखने वाले गुड्डे थे . सभी चकित थे की भला इनमे क्या अंतर हो सकता है ?

तभी किसी ने कहा , ” अरे , ये देखो इस गुड्डे के में एक छेद है .”

यह संकेत काफी था ,जल्द ही शिष्यों ने पता लगा लिया और गुरु जी से बोले ,

”गुरु जी इन गुड्डों में बस इतना ही अंतर है कि –

एक के दोनों कान में छेद है

दूसरे के एक कान और एक मुंह में छेद है ,

और तीसरे के सिर्फ एक कान में छेद है “

गुरु जी बोले , ” बिलकुल सही , और उन्होंने धातु का एक पतला तार देते हुए उसे कान के छेद में डालने के लिए कहा|”

शिष्यों ने वैसा ही किया . तार पहले गुड्डे के एक कान से होता हुआ दूसरे कान से निकल गया , दूसरे गुड्डे के कान से होते हुए मुंह से निकल गया और तीसरे के कान में घुसा पर कहीं से निकल नहीं पाया|

तब गुरु जी ने शिष्यों से गुड्डे अपने हाथ में लेते हुए कहा , ” प्रिय शिष्यों , इन तीन गुड्डों की तरह ही आपके जीवन में तीन तरह के व्यक्ति आयेंगे|

पहला गुड्डा ऐसे व्यक्तियों को दर्शाता है जो आपकी बात एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देंगे ,आप ऐसे लोगों से कभी अपनी समस्या साझा ना करें|

दूसरा गुड्डा ऐसे लोगों को दर्शाता है जो आपकी बात सुनते हैं और उसे दूसरों के सामने जा कर बोलते हैं , इनसे बचें , और कभी अपनी महत्त्वपूर्ण बातें इन्हें ना बताएँ।

और तीसरा गुड्डा ऐसे लोगों का प्रतीक है जिनपर आप भरोसा कर सकते हैं , और उनसे किसी भी तरह का विचार – विमर्श कर सकते हैं , सलाह ले सकते हैं , यही वो लोग हैं जो आपकी ताकत है और इन्हें आपको कभी नहीं खोना चाहिए|“

छत्रपति शिवाजी के जीवन के तीन प्रेरणादायक प्रसंग

19th Feb को शिवाजी जयंती होती है| इस शुभ अवसर पर मैं आपके साथ उनके जीवन के तीन प्रेरणादायक प्रसंग साझा कर रहा हूँ| आइये हम भारत वर्ष के इस वीर सपूत को नमन करें और उनके जीवन से शिक्षा ले भारत माता की सेवा में अग्रसर हों

                 प्रसंग  1


शिवाजी के समक्ष एक बार उनके सैनिक किसी गाँव के मुखिया को पकड़ कर ले लाये| मुखिया बड़ी-घनी मूछों वाला बड़ा ही रसूखदार व्यक्ति था, पर आज उसपर एक विधवा की इज्जत लूटने का आरोप साबित हो चुका था| उस समय शिवाजी मात्र १४ वर्ष के थे, पर वह बड़े ही बहादुर, निडर और न्याय प्रिय थे और विशेषकर महिलाओं के प्रति उनके मन में असीम सम्मान था| उन्होंने तत्काल अपना निर्णय सुना दिया , ” इसके दोनों हाथ , और पैर काट दो , ऐसे जघन्य अपराध के लिए इससे कम कोई सजा नहीं हो सकती|”

शिवाजी जीवन पर्यन्त साहसिक कार्य करते रहे और गरीब, बेसहारा लोगों को हमेशा प्रेम और सम्मान देते रहे|

                  प्रसंग 2


शिवाजी के साहस का एक और किस्सा प्रसिद्द है| तब पुणे के करीब नचनी गाँव में एक भयानक चीते का आतंक छाया हुआ था| वह अचानक ही कहीं से हमला करता था और जंगल में ओझल हो जाता| डरे हुए गाँव वाले अपनी समस्या लेकर शिवाजी के पास पहुंचे|

”हमें उस भयानक चीते से बचाइए | वह ना जाने कितने बच्चों को मार चुका है| ज्यादातर वह तब हमला करता है जब हम सब सो रहे होते हैं|”

शिवाजी ने धैर्यपूर्वक ग्रामीणों को सुना, ”आप लोग चिंता मत करिए, मैं यहाँ आपकी मदद करने के लिए ही हूँ|”

शिवाजी अपने सिपाहियों यसजी और कुछ सैनिकों के साथ जंगल में चीते को मारने के लिए निकल पड़े| बहुत ढूँढने के बाद जैसे ही वह सामने आया, सैनिक डर कर पीछे हट गए, पर शिवाजी और यसजी बिना डरे उसपर टूट पड़े और पलक झपकते ही उस मार गिराया| गाँव वाले खुश हो गए और “जय शिवाजी ” के नारे लगाने लगे|

                 प्रसंग 3


शिवाजी के पिता का नाम शाहजी था| वह अक्सर युद्ध लड़ने के लिए घर से दूर रहते थे| इसलिए उन्हें शिवाजी के निडर और पराक्रमी होने का अधिक ज्ञान नहीं था| किसी अवसर पर वह शिवाजी को बीजापुर के सुलतान के दरबार में ले गए| शाहजी ने तीन बार झुककर सुलतान को सलाम किया, और शिवाजी से भी ऐसा ही करने को कहा| लेकिन शिवाजी अपना सर ऊपर उठाये सीधे खड़े रहे| विदेशी शासक के सामने वह किसी भी कीमत पर सर झुकाने को तैयार नहीं हुए, और शेर की तरह शान से चलते हुए दरबार से वापस चले गए|

Secret of Success

 


एक बार एक नौजवान लड़के ने सुकरात से पूछा कि सफलता का रहस्य क्या है?


सुकरात ने उस लड़के से कहा कि तुम कल मुझे नदी के किनारे मिलो और वो मिले| फिर सुकरात ने नौजवान से उनके साथ नदी की तरफ बढ़ने को कहा| और जब आगे बढ़ते-बढ़ते पानी गले तक पहुँच गया, तभी अचानक सुकरात ने उस लड़के का सर पकड़ के पानी में डुबो दिया|

लड़का बाहर निकलने के लिए संघर्ष करने लगा| लेकिन सुकरात ताकतवर था और उसे तब तक डुबोये रखे जब तक की वो नीला नहीं पड़ने लगा | फिर सुकरात ने उसका सर पानी से बाहर निकाल दिया और बाहर निकलते ही जो चीज उस लड़के ने सबसे पहले की, वो थी हाँफते-हाँफते तेजी से सांस लेना|

सुकरात ने पूछा ,”जब तुम वहाँ थे तो तुम सबसे ज्यादा क्या चाहते थे?”

लड़के ने उत्तर दिया, "सांस लेना|"

सुकरात ने कहा, "यही सफलता का रहस्य है| जब तुम सफलता को उतनी ही बुरी तरह से चाहोगे जितना की तुम सांस लेना चाहते थे, तो वो तुम्हे मिल जाएगी| इसके आलावा और कोई रहस्य नहीं है|

दोस्तों, जब आप सिर्फ और सिर्फ एक चीज चाहते हैं तो more often than not… वो चीज आपको मिल जाती है| जैसे छोटे बच्चों को देख लीजिये| वे न past में जीते हैं न future में| वे हमेशा present में जीते है| और जब उन्हें खेलने के लिए कोई खिलौना चाहिए होता है या खाने के लिए कोई टॉफ़ी चाहिए होती है| तो उनका पूरा ध्यान, उनकी पूरी शक्ति बस उसी एक चीज को पाने में लग जाती है and as a result वे उस चीज को पा लेते हैं|

इसलिए सफलता पाने के लिए FOCUS बहुत ज़रूरी है| सफलता को पाने की जो चाहता है उसमे intensity होना बहुत ज़रूरी है| और जब आप वो फोकस और वो इंटेंसिटी पा लेते हैं तो सफलता आपको मिल ही जाती है|

ज़िन्दगी के पत्थर, कंकड़ और रेत

 

HAR HAR MAHADEV

Philosophy के एक Professor ने कुछ चीजों के साथ क्लास में प्रवेश किया| जब क्लास शुरू हुई तो उन्होंने एक बड़ा सा खाली शीशे का जार लिया और उसमे पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़े भरने लगे| फिर उन्होंने छात्रों से पूछा कि क्या जार भर गया है ? और सभी ने कहा “हाँ|


तब प्रोफ़ेसर ने छोटे-छोटे कंकडों से भरा एक बॉक्स लिया और उन्हें जार में भरने लगे| जार को थोडा हिलाने पर ये कंकड़ पत्थरों के बीच Settle हो गए| एक बार फिर उन्होंने छात्रों से पूछा कि क्या जार भर गया है? और सभी ने हाँ में उत्तर दिया|


तभी Professor ने एक sand box निकाला और उसमे भरी रेत को जार में डालने लगे| रेत ने बची-खुची जगह भी भर दी| और एक बार फिर उन्होंने पूछा कि क्या जार भर गया है? और सभी ने एक साथ उत्तर दिया , ” हाँ”|


फिर professor ने समझाना शुरू किया, ” मैं चाहता हूँ कि आप इस बात को समझें कि ये जार आपकी life को represent करता है| बड़े-बड़े पत्थर आपके जीवन की ज़रूरी चीजें हैं| आपकी family,आपका partner,आपकी health, आपके बच्चे ऐसी चीजें हैं कि अगर आपकी बाकी सारी चीजें खो भी जाएँ और सिर्फ ये रहे तो भी आपकी ज़िन्दगी पूर्ण रहेगी| ये कंकड़ कुछ अन्य चीजें हैं जो matter करती हैं- जैसे कि आपकी job, आपका घर, इत्यादि| और ये रेत बाकी सभी छोटी-मोटी चीजों को दर्शाती है|


अगर आप जार को पहले रेत से भर देंगे तो कंकडों और पत्थरों के लिए कोई जगह नहीं बचेगी| यही आपकी life के साथ होता है| अगर आप अपनी सारा समय और उर्जा छोटी-छोटी चीजों में लगा देंगे तो आपके पास कभी उन चीजों के लिए time नहीं होगा जो आपके लिए Important हैं| उन चीजों पर ध्यान दीजिये जो आपकी ख़ुशी के लिए ज़रूरी हैं| बच्चों के साथ खेलिए, अपने partner के साथ dance कीजिये| काम पर जाने के लिए, घर साफ़ करने के लिए, party देने के लिए, हमेशा वक़्त होगा| पर पहले पत्थरों पर ध्यान दीजिये| ऐसी चीजें जो सचमुच matter करती हैं | अपनी priorities set कीजिये| बाकी चीजें बस रेत हैं|